अध्याय 6 ध्यान योग
मनुष्य का मन उसका सबसे बड़ा मित्र भी बन सकता है और सबसे बड़ा शत्रु भी। इस अध्याय में श्रीकृष्ण मन को संयमित करने, ध्यान का अभ्यास करने और आंतरिक स्थिरता प्राप्त करने की विधि बताते हैं। इस अध्याय से हमें यह सीखने को मिलता है कि अनुशासित जीवन, संतुलित दिनचर्या और निरंतर अभ्यास के माध्यम से मानसिक चंचलता को कैसे शांत किया जा सकता है। यह अध्याय आत्म-जागरूकता, एकाग्रता, करुणा और गहन आंतरिक शांति की दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करता है।
श्लोक सूची
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श्लोक 1
निष्काम कर्मयोगी ही वास्तविक संन्यासी और योगी है
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥ ६.१॥
जो मनुष्य कर्मफल का आश्रय लिए बिना केवल कर्तव्य समझकर कर्म करता है, वही वास्तविक संन्यासी और योगी है। केवल यज्ञादि कर्मों का त्याग कर देना या कर्म न करना संन्यास और योग नहीं है।
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श्लोक 2
कर्मयोग ही वास्तविक संन्यास है
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव।
न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन॥ ६.२॥
हे अर्जुन! जिसे लोग संन्यास कहते हैं, उसी को तुम योग जानो। क्योंकि जिसने संकल्पों और कामनाओं का त्याग नहीं किया है, वह कोई भी व्यक्ति योगी नहीं बन सकता।
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श्लोक 3
योगारूढ़ होने से पहले कर्म साधन है, बाद में शम
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते॥ ६.३॥
जो मननशील साधक योग की अवस्था को प्राप्त करना चाहता है, उसके लिए निष्काम कर्म साधन कहा गया है। किन्तु जो योग में स्थित हो चुका है, उसके लिए मन की शान्ति और विषयों से निवृत्ति ही आगे की प्रगति का साधन कही गई है।
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श्लोक 4
योगारूढ़ की पहचान
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते।
सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते॥ ६.४॥
जब मनुष्य न तो इन्द्रियों के विषयों में आसक्त होता है और न ही कर्मों में आसक्ति रखता है, तथा सभी कामनाजन्य संकल्पों का त्याग कर देता है, तब वह योगारूढ़ अर्थात् योग में स्थित कहा जाता है।
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श्लोक 5
स्वयं अपना उद्धार करे, स्वयं को अधोगति में न ले जाए
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥ ६.५॥
मनुष्य को चाहिए कि वह अपने मन और विवेक के द्वारा स्वयं अपना उत्थान करे, स्वयं को अधोगति में न ले जाए। क्योंकि मनुष्य का मन ही उसका मित्र है और वही उसका शत्रु भी बन सकता है।
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श्लोक 6
जितेन्द्रिय पुरुष का मन मित्र, अजितेन्द्रिय का शत्रु
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्॥ ६.६॥
जिस व्यक्ति ने अपने मन को विवेक और साधना के द्वारा वश में कर लिया है, उसका मन उसका सच्चा मित्र बन जाता है। किन्तु जिसने अपने मन को वश में नहीं किया, उसके लिए वही मन शत्रु के समान व्यवहार करता है।
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श्लोक 7
जितेन्द्रिय योगी परमात्मा में स्थित रहता है
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥ ६.७॥
जिस साधक ने अपने मन को जीत लिया है और जो भीतर से शान्त है, उसके अन्तःकरण में परमात्मा दृढ़तापूर्वक स्थित रहते हैं। ऐसा योगी सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख तथा मान-अपमान जैसी द्वन्द्वात्मक परिस्थितियों में भी समभाव बनाए रखता है।
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श्लोक 8
ज्ञान-विज्ञान से तृप्त योगी समदर्शी होता है
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः॥ ६.८॥
जो साधक शास्त्रीय ज्ञान और प्रत्यक्ष आध्यात्मिक अनुभूति से पूर्ण सन्तुष्ट है, जिसका चित्त स्थिर है और जिसने इन्द्रियों को वश में कर लिया है, वह योगी वास्तव में योगयुक्त कहलाता है। ऐसा योगी मिट्टी, पत्थर और सोने को समान दृष्टि से देखता है।
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श्लोक 9
समदृष्टि वाला योगी सभी के प्रति समान भाव रखता है
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते॥ ६.९॥
जो योगी निष्काम हितैषी, मित्र, शत्रु, तटस्थ, मध्यस्थ, अप्रिय व्यक्ति, सम्बन्धी, सज्जन और पापी—सभी के प्रति समान बुद्धि रखता है, वह विशेष रूप से श्रेष्ठ माना जाता है।
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श्लोक 10
योगी को एकान्त में निरन्तर मन को योग में लगाना चाहिए
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥ ६.१०॥
योगी को चाहिए कि वह एकान्त स्थान में स्थित होकर निरन्तर अपने मन को योग में लगाए। वह अकेला रहे, मन और अन्तःकरण को संयमित रखे, अपेक्षाओं से मुक्त हो तथा अनावश्यक संग्रह न करे।
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श्लोक 11
ध्यान के लिए उपयुक्त आसन की व्यवस्था
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्॥ ६.११॥
योगी को चाहिए कि वह स्वच्छ और पवित्र स्थान में अपने लिए एक स्थिर आसन स्थापित करे, जो न बहुत ऊँचा हो और न बहुत नीचा। उस आसन पर कुश, मृगचर्म और वस्त्र की उचित व्यवस्था हो, जिससे ध्यान के लिए अनुकूल वातावरण बने।
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श्लोक 12
एकाग्र चित्त से आत्मशुद्धि के लिए योगाभ्यास
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये॥ ६.१२॥
उस आसन पर बैठकर मन को एकाग्र करे तथा मन और इन्द्रियों की क्रियाओं को संयमित रखे। इस प्रकार साधक को अन्तःकरण की शुद्धि के लिए योगाभ्यास करना चाहिए।
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श्लोक 13
शरीर, सिर और गर्दन को सीधा रखकर ध्यान करे
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः।
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्॥ ६.१३॥
योगी को शरीर, सिर और गर्दन को सीधा तथा स्थिर रखना चाहिए। अपनी दृष्टि को नासिका के अग्रभाग पर स्थिर रखते हुए इधर-उधर नहीं देखना चाहिए। इस प्रकार वह ध्यान में एकाग्रता प्राप्त करता है।
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श्लोक 14
निर्भय और ब्रह्मचारी होकर भगवान् में मन लगाना
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः॥ ६.१४॥
साधक को चाहिए कि वह शान्तचित्त, निर्भय तथा ब्रह्मचर्य-व्रत में स्थित रहे। मन को संयमित करके मेरा चिन्तन करे और मुझे ही परम लक्ष्य मानकर योग में स्थित रहे।
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श्लोक 15
निरन्तर योगाभ्यास से परम शान्ति की प्राप्ति
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति॥ ६.१५॥
इस प्रकार निरन्तर योगाभ्यास करने वाला और मन को संयमित रखने वाला योगी परम निर्वाणमयी शान्ति को प्राप्त करता है, जो भगवान् में स्थित है और भगवान् से प्राप्त होने वाली सर्वोच्च शान्ति है।
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श्लोक 16
अत्यधिक भोजन या उपवास करने वाले का योग सिद्ध नहीं होता
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥ ६.१६॥
हे अर्जुन! जो अत्यधिक भोजन करता है उसका योग सिद्ध नहीं होता, और जो अत्यधिक उपवास करता है उसका भी नहीं। इसी प्रकार जो बहुत अधिक सोता है या जो बिल्कुल नहीं सोता, उसका भी योग सिद्ध नहीं होता।
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श्लोक 17
संयमित आहार-विहार और कर्म से योग दुःखनाशक बनता है
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥ ६.१७॥
जो व्यक्ति भोजन, व्यवहार, कर्म, निद्रा और जागरण में संयम रखता है, उसका योग दुःखों का नाश करने वाला बन जाता है। संतुलित जीवनशैली योग-साधना की सफलता का आधार है।
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श्लोक 18
जब मन आत्मा में स्थित हो जाता है तब योग सिद्ध माना जाता है
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥ ६.१८॥
जब साधक का संयमित चित्त आत्मा में ही स्थिर हो जाता है और वह समस्त कामनाओं से निःस्पृह हो जाता है, तब उसे वास्तव में योगयुक्त कहा जाता है।
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श्लोक 19
स्थिर चित्त योगी की उपमा वायु-रहित स्थान के दीपक से
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥ ६.१९॥
जैसे वायु-रहित स्थान में रखा हुआ दीपक नहीं डोलता, वैसे ही आत्मसाक्षात्कार के लिए योगाभ्यास करने वाले संयमित चित्त योगी का मन स्थिर रहता है। यही उसकी उपमा कही गई है।
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श्लोक 20
योगाभ्यास से चित्त निरुद्ध होकर आत्मा में तुष्ट होता है
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति॥ ६.२०॥
जब योगाभ्यास के द्वारा चित्त पूर्णतः नियंत्रित होकर शान्त हो जाता है और साधक शुद्ध अन्तःकरण से आत्मा का अनुभव करके आत्मा में ही सन्तुष्ट हो जाता है, तब वह योग की उच्च अवस्था को प्राप्त करता है।
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श्लोक 21
बुद्धिग्राह्य और इन्द्रियातीत परम सुख की अनुभूति
सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः॥ ६.२१॥
जिस अवस्था में साधक इन्द्रियों से परे, केवल शुद्ध बुद्धि द्वारा अनुभव किए जाने वाले परम आनन्द को प्राप्त करता है, और जिसमें स्थित होकर वह सत्य से कभी विचलित नहीं होता, वही योग की उच्च अवस्था है।
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श्लोक 22
जिस लाभ से बढ़कर कोई लाभ नहीं और जिसमें दुःख विचलित नहीं करता
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥ ६.२२॥
जिस आत्मिक आनन्द और परम अवस्था को प्राप्त करके साधक उससे बढ़कर किसी अन्य लाभ को नहीं मानता, और जिसमें स्थित होकर वह बड़े से बड़े दुःख से भी विचलित नहीं होता, वही योग की सर्वोच्च उपलब्धि है।
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श्लोक 23
दुःखसंयोग से वियोग ही योग कहलाता है
तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा॥ ६.२३॥
जिस अवस्था में मनुष्य दुःख के संयोग से अलग हो जाता है, उसे योग कहा जाता है। इस योग का अभ्यास दृढ़ निश्चय के साथ और बिना निराश हुए, उत्साहपूर्ण चित्त से करना चाहिए।
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श्लोक 24
संकल्पजन्य कामनाओं का त्याग और मन द्वारा इन्द्रिय-निग्रह
सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः॥ ६.२४॥
मनुष्य को चाहिए कि वह संकल्पों से उत्पन्न होने वाली सभी कामनाओं का पूर्णतः त्याग करे और मन के द्वारा समस्त इन्द्रियों को हर प्रकार से नियंत्रित रखे। यही ध्यानयोग की उन्नति का महत्वपूर्ण साधन है।
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श्लोक 25
धीरे-धीरे बुद्धि द्वारा मन को आत्मा में स्थिर करना
शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥ ६.२५॥
साधक को चाहिए कि वह धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा धीरे-धीरे मन को बाहरी विषयों से हटाकर शान्त करे। मन को आत्मा में स्थिर करके अन्य किसी विषय का चिन्तन न करे।
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श्लोक 26
चंचल मन को बार-बार आत्मा में लगाना चाहिए
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥ ६.२६॥
यह चंचल और अस्थिर मन जिस-जिस विषय की ओर भटक जाए, वहाँ-वहाँ से उसे नियंत्रित करके पुनः आत्मा में ही स्थापित करना चाहिए। यही ध्यानयोग का अभ्यास है।
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श्लोक 27
शान्त मन वाले योगी को उत्तम सुख की प्राप्ति
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्॥ ६.२७॥
जिस योगी का मन पूर्णतः शान्त हो गया है, जिसका रजोगुण शान्त हो चुका है, जो पाप और दोषों से रहित होकर ब्रह्मभाव को प्राप्त हो गया है, उसे निश्चय ही परम श्रेष्ठ सुख प्राप्त होता है।
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श्लोक 28
निरन्तर योगाभ्यास से ब्रह्मसंस्पर्शरूप परम सुख की प्राप्ति
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते॥ ६.२८॥
इस प्रकार निरन्तर योगाभ्यास करने वाला और पाप-दोषों से रहित योगी सहज ही ब्रह्म के संस्पर्श को प्राप्त करता है तथा उस ब्रह्मानुभूति से उत्पन्न परम और अनन्त सुख का अनुभव करता है।
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श्लोक 29
समदर्शी योगी सब प्राणियों में आत्मा और परमात्मा को देखता है
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥ ६.२९॥
योगयुक्त और समदर्शी योगी सभी प्राणियों में आत्मा को तथा सभी प्राणियों को आत्मा में स्थित देखता है। वह सबमें एक ही दिव्य तत्त्व का दर्शन करता है।
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श्लोक 30
जो मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥ ६.३०॥
जो साधक मुझे सम्पूर्ण जगत में और सम्पूर्ण जगत को मुझमें देखता है, उसके लिए मैं कभी ओझल नहीं होता और वह भी मुझसे कभी अलग नहीं होता।
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श्लोक 31
सब प्राणियों में स्थित भगवान् का भजन करने वाला योगी
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥ ६.३१॥
जो योगी एकत्वभाव से सभी प्राणियों में स्थित मुझे भजता है, वह किसी भी परिस्थिति में रहता हुआ भी वास्तव में मुझमें ही स्थित रहता है।
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श्लोक 32
जो सबको अपने समान देखता है वही श्रेष्ठ योगी है
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥ ६.३२॥
हे अर्जुन! जो व्यक्ति अपने समान ही सभी प्राणियों को देखता है तथा दूसरों के सुख और दुःख को अपने सुख-दुःख के समान अनुभव करता है, वही मेरे मत में श्रेष्ठ योगी है।
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श्लोक 33
अर्जुन का प्रश्न — चंचल मन के कारण योग की स्थिरता कठिन प्रतीत होती है
अर्जुन उवाच
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम्॥ ६.३३॥
अर्जुन बोले— हे मधुसूदन! आपने जो समत्वयुक्त योग बताया है, मन की चंचलता के कारण मैं उसकी स्थिर अवस्था को सम्भव नहीं देखता।
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श्लोक 34
अर्जुन का कथन — मन अत्यन्त चंचल और वश में करना कठिन है
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥ ६.३४॥
हे कृष्ण! मन निश्चय ही अत्यन्त चंचल, उद्विग्न करने वाला, बलवान और हठी है। इसलिए मैं इसे वश में करना वायु को रोकने के समान अत्यन्त कठिन मानता हूँ।
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श्लोक 35
अभ्यास और वैराग्य से मन को वश में किया जा सकता है
श्रीभगवानुवाच
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥ ६.३५॥
श्रीभगवान् ने कहा— हे महाबाहु अर्जुन! निःसन्देह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है, किन्तु हे कुन्तीपुत्र! अभ्यास और वैराग्य के द्वारा इसे नियंत्रित किया जा सकता है।
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श्लोक 36
असंयमी के लिए योग कठिन, संयमी के लिए साध्य है
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः॥ ६.३६॥
मेरा मत है कि जिसका मन संयमित नहीं है, उसके लिए योग प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है। किन्तु जिसने मन को वश में कर लिया है और जो निरन्तर प्रयत्न करता है, वह उचित साधनों द्वारा योग को प्राप्त कर सकता है।
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श्लोक 37
योग से च्युत साधक की गति के विषय में अर्जुन का प्रश्न
अर्जुन उवाच
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति॥ ६.३७॥
अर्जुन बोले— हे कृष्ण! जो साधक श्रद्धावान तो है, किन्तु पर्याप्त प्रयास नहीं कर पाता और जिसका मन योग से विचलित हो जाता है, वह योग की पूर्ण सिद्धि प्राप्त किए बिना किस गति को प्राप्त होता है?
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श्लोक 38
क्या योगभ्रष्ट साधक दोनों ओर से नष्ट हो जाता है?
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति।
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि॥ ६.३८॥
हे महाबाहु कृष्ण! क्या ऐसा साधक, जो योगमार्ग से विचलित हो गया हो, दोनों ओर से वंचित होकर ब्रह्मप्राप्ति के मार्ग में भ्रमित व्यक्ति की तरह टूटे हुए बादल के समान नष्ट हो जाता है?
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श्लोक 39
अर्जुन की प्रार्थना — इस संशय का निवारण केवल आप ही कर सकते हैं
एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते॥ ६.३९॥
हे कृष्ण! कृपया मेरे इस सन्देह का पूर्ण रूप से निवारण कीजिए, क्योंकि आपके अतिरिक्त इस संशय को दूर करने वाला कोई अन्य मुझे दिखाई नहीं देता।
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श्लोक 40
कल्याणकारी प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता
श्रीभगवानुवाच
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति॥ ६.४०॥
श्रीभगवान् ने कहा— हे पार्थ! उस साधक का न तो इस लोक में और न ही परलोक में कोई विनाश होता है। हे प्रिय अर्जुन! कल्याणकारी कर्म करने वाला कोई भी व्यक्ति कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।
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श्लोक 41
योगभ्रष्ट साधक पुण्यलोक में जाकर श्रेष्ठ कुल में जन्म लेता है
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते॥ ६.४१॥
योगभ्रष्ट साधक पहले पुण्यात्माओं के लोकों को प्राप्त करके वहाँ दीर्घकाल तक निवास करता है। उसके बाद वह पवित्र आचरण वाले तथा समृद्ध परिवार में जन्म लेता है।
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श्लोक 42
या फिर योगियों के कुल में जन्म प्राप्त होता है
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्।
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्॥ ६.४२॥
या फिर ऐसा योगभ्रष्ट साधक ज्ञानवान योगियों के परिवार में जन्म लेता है। इस प्रकार का जन्म संसार में अत्यन्त दुर्लभ माना गया है।
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श्लोक 43
पूर्वजन्म की बुद्धि से पुनः योगमार्ग की ओर आकर्षित होता है
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन॥ ६.४३॥
हे कुरुनन्दन! ऐसे योगभ्रष्ट साधक को उस जन्म में अपने पूर्वजन्म की आध्यात्मिक बुद्धि और संस्कार पुनः प्राप्त हो जाते हैं। फिर वह योग की पूर्ण सिद्धि प्राप्त करने के लिए पहले से भी अधिक प्रयत्न करता है।
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श्लोक 44
पूर्वाभ्यास के प्रभाव से साधक अनायास ही योग की ओर आकर्षित होता है
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते॥ ६.४४॥
पूर्व जन्म के अभ्यास के प्रभाव से वह योगभ्रष्ट साधक अनायास ही योगमार्ग की ओर आकर्षित हो जाता है। योग के विषय में जिज्ञासा रखने वाला साधक भी वेदों के कर्मकाण्डमय भाग से आगे बढ़कर उच्च आध्यात्मिक सत्य की ओर अग्रसर हो जाता है।
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श्लोक 45
अनेक जन्मों के प्रयास से योगी परम गति को प्राप्त करता है
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्॥ ६.४५॥
किन्तु निरन्तर प्रयत्न करने वाला और जिसके पाप-दोष शुद्ध हो चुके हैं, ऐसा योगी अनेक जन्मों में क्रमशः सिद्धि प्राप्त करके अन्ततः परम गति को प्राप्त हो जाता है।
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श्लोक 46
योगी तपस्वियों, ज्ञानियों और कर्मियों से श्रेष्ठ है
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन॥ ६.४६॥
योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, केवल शास्त्रीय ज्ञान रखने वाले ज्ञानियों से भी श्रेष्ठ माना गया है और कर्मकाण्डी कर्म करने वालों से भी श्रेष्ठ है। इसलिए हे अर्जुन! तुम योगी बनो।
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श्लोक 47
सभी योगियों में भक्तियोगी सर्वोत्तम है
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः॥ ६.४७॥
सभी योगियों में भी वह योगी मेरे मत में सर्वोत्तम है, जो श्रद्धा सहित अपने अन्तःकरण को मुझमें लगाकर प्रेमपूर्वक मेरा भजन करता है।
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