भगवद्गीता 6.16 — अत्यधिक भोजन या उपवास करने वाले का योग सिद्ध नहीं होता
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥ ६.१६॥
हे अर्जुन! जो अत्यधिक भोजन करता है उसका योग सिद्ध नहीं होता, और जो अत्यधिक उपवास करता है उसका भी नहीं। इसी प्रकार जो बहुत अधिक सोता है या जो बिल्कुल नहीं सोता, उसका भी योग सिद्ध नहीं होता।
पदच्छेद
संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।
शब्दार्थ
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|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| न | नहीं |
| अत्यश्नतः | अत्यधिक खाने वाले का |
| तु | तो |
| योगः | योग |
| अस्ति | होता है |
| न | न |
| च | और न |
| एकान्तम् | अत्यन्त |
| अनश्नतः | न खाने वाले का |
| पंक्ति 2 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| न | न |
| च | और न |
| अतिस्वप्नशीलस्य | अत्यधिक सोने वाले का |
| जाग्रतः | जागते रहने वाले का |
| न | नहीं |
| एव | ही |
| च | और |
| अर्जुन | हे अर्जुन! |
| पंक्ति 1 | पंक्ति 2 | ||
|---|---|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ | संस्कृत शब्द | अर्थ |
| न | नहीं | न | न |
| अत्यश्नतः | अत्यधिक खाने वाले का | च | और न |
| तु | तो | अतिस्वप्नशीलस्य | अत्यधिक सोने वाले का |
| योगः | योग | जाग्रतः | जागते रहने वाले का |
| अस्ति | होता है | न | नहीं |
| न | न | एव | ही |
| च | और न | च | और |
| एकान्तम् | अत्यन्त | अर्जुन | हे अर्जुन! |
| अनश्नतः | न खाने वाले का | ||
विस्तृत विवरण
परिचय
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अत्यधिक तपस्या और अत्यधिक भोग दोनों से सावधान करते हुए योग के मार्ग में संतुलन के महत्व को स्पष्ट करते हैं।
भावार्थ
श्रीकृष्ण का गहरा व्यावहारिक विश्लेषण
भगवान श्रीकृष्ण यहाँ योग के एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत को सामने रखते हैं—संतुलन। वे बताते हैं कि किसी भी प्रकार की अति साधना की प्रगति में बाधक बन सकती है।
नात्यश्नतस्तु: जो व्यक्ति अत्यधिक भोजन करता है, उसका शरीर भारी और मन सुस्त हो जाता है। ऐसी अवस्था में एकाग्रता और ध्यान कठिन हो जाते हैं।
न चैकान्तमनश्नतः: दूसरी ओर अत्यधिक उपवास या शरीर को अनावश्यक कष्ट देना भी उचित नहीं है। कमजोर शरीर और थका हुआ मन भी ध्यान के लिए उपयुक्त नहीं होते।
न चाति स्वप्नशीलस्य: अत्यधिक सोना आलस्य और जड़ता को बढ़ाता है। इससे सजगता और मानसिक स्पष्टता कम हो जाती है।
जाग्रतो नैव चार्जुन: इसी प्रकार अत्यधिक जागरण और विश्राम की कमी भी मन को अस्थिर और कमजोर बना देती है।
भगवान श्रीकृष्ण का संदेश स्पष्ट है कि योग का मार्ग शरीर और मन दोनों के संतुलित विकास का मार्ग है। न तो भोग में डूबना उचित है और न ही अनावश्यक कठोरता अपनाना।
हमारे जीवन के लिए संदेश (The Power of Balance)
अति हर क्षेत्र में हानिकारक है: चाहे भोजन हो, नींद हो, काम हो या मनोरंजन—हर क्षेत्र में संतुलन आवश्यक है।
व्यावहारिक तरीका: अपने दैनिक जीवन में ऐसी दिनचर्या विकसित करें जिसमें पर्याप्त विश्राम, संतुलित भोजन और नियमित कार्य शामिल हों। संतुलित जीवनशैली मन को स्थिर और साधना के योग्य बनाती है।
आगे का विषय
भगवान श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट कर दिया कि योग की सफलता के लिए जीवन में संतुलन आवश्यक है। अब वे आगे बताते हैं कि भोजन, विश्राम, कर्म और नींद में उचित संयम रखने वाला साधक किस प्रकार योग के द्वारा दुःखों से मुक्ति प्राप्त करता है।
इस श्लोक में छिपे संदेश
इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।
सूत्र
अत्यधिकता योग की शत्रु है।
अधिक भोजन और अत्यधिक उपवास दोनों संतुलन बिगाड़ते हैं।
उचित नींद मानसिक और आध्यात्मिक प्रगति में सहायक है।
योग संतुलन का विज्ञान है, अतियों का नहीं।
स्वस्थ शरीर साधना का सहायक साधन है।
नियमित दिनचर्या मन को स्थिर बनाती है।
दीर्घकालिक प्रगति संतुलित आदतों से बनती है।