भगवद्गीता 5.17 — ब्रह्म में स्थित ज्ञानी पुनर्जन्म से मुक्त होते हैं

तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥ ५.१७ ॥

जिनकी बुद्धि, मन, निष्ठा और परम लक्ष्य सब उस परम ब्रह्म में स्थित हैं तथा जिनके पाप ज्ञान द्वारा नष्ट हो चुके हैं, वे पुनर्जन्म रहित परम अवस्था को प्राप्त होते हैं।

पदच्छेद

संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।

तद्बुद्धयः तदात्मानः
तन्निष्ठाः तत्परायणाः ।
गच्छन्ति अपुनरावृत्तिम्
ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥

शब्दार्थ

पंक्ति 1
संस्कृत शब्द अर्थ
तद्बुद्धयः जिनकी बुद्धि उसमें (ब्रह्म में) स्थित है
तदात्मानः जिनका मन उसी में लगा है
तन्निष्ठाः जो उसी में स्थित हैं
तत्परायणाः उसी को परम लक्ष्य मानने वाले
पंक्ति 2
संस्कृत शब्द अर्थ
गच्छन्ति प्राप्त होते हैं
अपुनरावृत्तिम् पुनर्जन्मरहित अवस्था को
ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ज्ञान द्वारा जिनके पाप नष्ट हो गये हैं
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संस्कृत शब्द अर्थ संस्कृत शब्द अर्थ
तद्बुद्धयः जिनकी बुद्धि उसमें (ब्रह्म में) स्थित है गच्छन्ति प्राप्त होते हैं
तदात्मानः जिनका मन उसी में लगा है अपुनरावृत्तिम् पुनर्जन्मरहित अवस्था को
तन्निष्ठाः जो उसी में स्थित हैं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ज्ञान द्वारा जिनके पाप नष्ट हो गये हैं
तत्परायणाः उसी को परम लक्ष्य मानने वाले

विस्तृत विवरण

परिचय

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण उस साधक की अवस्था का वर्णन करते हैं जिसने अपने जीवन का केंद्र परम सत्य को बना लिया है और जिसका संपूर्ण व्यक्तित्व उसी में एकाग्र हो गया है।

भावार्थ

परमात्मा में पूर्ण स्थिरता के चार स्तंभ

भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में एक क्रमिक प्रक्रिया बताते हैं जिसके माध्यम से साधक पूर्ण मुक्ति की ओर अग्रसर होता है।

तद्बुद्धयः: ज्ञानी की बुद्धि संसार की अस्थायी वस्तुओं में उलझी नहीं रहती। उसका चिंतन परम सत्य की ओर उन्मुख हो जाता है।

तदात्मानः: उसका मन और अंतःकरण परमात्मा के प्रेम और स्मरण में इतना रच-बस जाता है कि उसका समूचा जीवन उसी से प्रेरित होने लगता है।

तन्निष्ठाः: उसकी निष्ठा अडिग हो जाती है। परिस्थितियाँ बदल सकती हैं, लेकिन उसका विश्वास और आंतरिक स्थिरता नहीं डगमगाते।

तत्परायणाः: उसका अंतिम आश्रय और लक्ष्य केवल परमात्मा होते हैं। वह बाहरी उपलब्धियों को जीवन का अंतिम उद्देश्य नहीं मानता।

ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः: ज्ञान के प्रभाव से उसके भीतर के दोष, भ्रम और मानसिक अशुद्धियाँ धीरे-धीरे समाप्त हो जाती हैं। इसी कारण वह पुनर्जन्म रूपी बंधनों से मुक्त होने की दिशा में आगे बढ़ता है।

हमारे जीवन के लिए संदेश

यह श्लोक दिखाता है कि आध्यात्मिक विकास केवल एक विचार नहीं, बल्कि संपूर्ण व्यक्तित्व का रूपांतरण है।

एकाग्रता की शक्ति: जब जीवन में कोई उच्च उद्देश्य स्पष्ट हो जाता है, तब बिखरी हुई ऊर्जा एक दिशा में प्रवाहित होने लगती है।

आंतरिक शुद्धि: स्थायी परिवर्तन तब आता है जब ज्ञान केवल बुद्धि तक सीमित न रहकर जीवन का हिस्सा बन जाता है। यही स्थिति व्यक्ति को गहरी शांति, स्पष्टता और स्वतंत्रता की ओर ले जाती है।

आगे का विषय

भगवान श्रीकृष्ण ने उस ज्ञानी की अवस्था का वर्णन किया जो परमात्मा में स्थिर हो चुका है। अब अगले श्लोक में वे बताएंगे कि ऐसा ज्ञानी संसार के विभिन्न व्यक्तियों और प्राणियों को किस दृष्टि से देखता है।

इस श्लोक में छिपे संदेश

इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।

ज्ञानयोग
ब्रह्मनिष्ठा आत्मज्ञान मोक्ष
आध्यात्मिक
अपुनरावृत्ति परमगति
भक्ति-दृष्टि
भगवत्परायणता एकनिष्ठता
दार्शनिक
ब्रह्म में स्थित होना
मनोवैज्ञानिक
एकाग्रता आन्तरिक केन्द्रितता
कर्मयोग
चित्तशुद्धि से ज्ञान
नैतिक
दोषों का क्षय
व्यावहारिक
जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य
सामाजिक
मूल्य-आधारित जीवन
नेतृत्व
Single-Pointed Vision
प्रबन्धन
Goal Alignment
मानवता
आत्मिक उत्कर्ष
व्यक्तित्व-विकास
Purpose-Centered Living
साधना-दृष्टि
निष्ठा समर्पण

सूत्र

जहाँ बुद्धि, मन और लक्ष्य एक हो जाते हैं, वहाँ साधना गहरी हो जाती है।

सच्चा ज्ञान केवल जानकारी नहीं, आन्तरिक परिवर्तन है।

ज्ञान का अंतिम फल पुनर्जन्म के बन्धन से मुक्ति है।

बिखरा हुआ मन संसार में भटकता है, केन्द्रित मन सत्य तक पहुँचता है।

जिसे जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य बना लिया जाए, वही साधक को रूपान्तरित करता है।

ज्ञान का प्रकाश दोषों और भ्रमों को धो देता है।

निरन्तर निष्ठा साधना को सिद्धि तक पहुँचाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'तद्बुद्धयः' का क्या अर्थ है?
जिनकी बुद्धि परम सत्य या ब्रह्म में स्थिर हो गई है, उन्हें 'तद्बुद्धयः' कहा गया है।
'तत्परायणाः' किसे कहा गया है?
जो परम सत्य को ही अपना सर्वोच्च आश्रय, लक्ष्य और जीवन का केन्द्र मानते हैं।
'अपुनरावृत्ति' का क्या अर्थ है?
यह पुनर्जन्म से मुक्ति की अवस्था है, जहाँ जीव संसार के चक्र में पुनः नहीं लौटता।
'ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः' का क्या तात्पर्य है?
ज्ञान के प्रभाव से जिनके दोष, पाप, भ्रम और अज्ञान दूर हो गए हैं, उन्हें 'ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः' कहा गया है।
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
जब जीवन की समस्त शक्तियाँ एक उच्चतम सत्य और उद्देश्य की ओर केन्द्रित हो जाती हैं, तब वास्तविक आन्तरिक रूपान्तरण प्रारम्भ होता है।