भगवद्गीता 5.9 — इन्द्रियाँ अपने विषयों में ही प्रवृत्त हैं

प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥ ५.९ ॥

बोलते हुए, त्यागते हुए, ग्रहण करते हुए, आँखें खोलते और बन्द करते हुए भी तत्त्वज्ञानी यह समझता है कि केवल इन्द्रियाँ ही अपने-अपने विषयों में प्रवृत्त हैं।

पदच्छेद

संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।

प्रलपन् विसृजन् गृह्णन्
उन्मिषन् निमिषन् अपि ।
इन्द्रियाणि इन्द्रियार्थेषु
वर्तन्ते इति धारयन् ॥

शब्दार्थ

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संस्कृत शब्द अर्थ
प्रलपन् बोलता हुआ
विसृजन् त्यागता हुआ
गृह्णन् ग्रहण करता हुआ
उन्मिषन् आँखें खोलता हुआ
निमिषन् आँखें बन्द करता हुआ
अपि भी
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संस्कृत शब्द अर्थ
इन्द्रियाणि इन्द्रियाँ
इन्द्रियार्थेषु इन्द्रियों के विषयों में
वर्तन्ते विचरण करती हैं
इति ऐसा
धारयन् मानते हुए, समझते हुए
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संस्कृत शब्द अर्थ संस्कृत शब्द अर्थ
प्रलपन् बोलता हुआ इन्द्रियाणि इन्द्रियाँ
विसृजन् त्यागता हुआ इन्द्रियार्थेषु इन्द्रियों के विषयों में
गृह्णन् ग्रहण करता हुआ वर्तन्ते विचरण करती हैं
उन्मिषन् आँखें खोलता हुआ इति ऐसा
निमिषन् आँखें बन्द करता हुआ धारयन् मानते हुए, समझते हुए
अपि भी

विस्तृत विवरण

परिचय

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण पिछले श्लोक में बताए गए साक्षीभाव को और विस्तार से समझाते हैं। वे बताते हैं कि ज्ञानी व्यक्ति दैनिक जीवन की साधारण क्रियाओं के बीच भी स्वयं को कर्मों का कर्ता नहीं मानता।

भावार्थ

इंद्रियों का विज्ञान

यह श्लोक पिछले श्लोक के साथ मिलकर अहंकार से मुक्त होकर कर्म करने की कला सिखाता है। भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि ज्ञानी व्यक्ति जीवन की प्रत्येक गतिविधि को सही दृष्टि से देखता है।

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्ते: आँखों का कार्य देखना है, कानों का कार्य सुनना है, जीभ का कार्य स्वाद लेना है और हाथ-पैरों का कार्य अपनी-अपनी गतिविधियाँ करना है। ये सभी क्रियाएँ प्रकृति के नियमों के अनुसार चलती रहती हैं।

ज्ञानी की धारणा: साधारण व्यक्ति प्रत्येक क्रिया के साथ स्वयं को जोड़ लेता है और कहता है कि मैं बोल रहा हूँ, मैं पकड़ रहा हूँ, मैं कर रहा हूँ। लेकिन तत्वज्ञानी जानता है कि यह इंद्रियों और उनके विषयों का परस्पर संपर्क मात्र है। उसकी वास्तविक पहचान इन गतिविधियों से परे स्थित आत्मा है।

साक्षी की स्थिति: ज्ञानी व्यक्ति अपने भीतर एक ऐसी चेतना का अनुभव करता है जो सभी गतिविधियों को देखती है, पर स्वयं उनसे प्रभावित नहीं होती। वह जीवन के नाटक को देखता है, पर उसमें उलझता नहीं है।

हमारे जीवन के लिए संदेश

यह श्लोक हमें अपने विचारों, भावनाओं और प्रतिक्रियाओं से एक स्वस्थ दूरी बनाने की कला सिखाता है।

मानसिक दूरी का महत्व: जब हम क्रोध, भय या उदासी के साथ स्वयं को पूरी तरह जोड़ लेते हैं, तब वे भावनाएँ हम पर हावी हो जाती हैं। लेकिन यदि हम उन्हें साक्षी भाव से देखना सीख लें, तो उनका प्रभाव कम होने लगता है।

आत्म-नियंत्रण की शुरुआत: जब व्यक्ति अपने मन और इंद्रियों की गतिविधियों को देखने लगता है, तब वह उनका दास नहीं रहता। धीरे-धीरे वह अपने जीवन का वास्तविक स्वामी बनने लगता है।

आगे का विषय

जब साधक इस प्रकार स्वयं को कर्मों का कर्ता मानना छोड़ देता है, तब संसार में किए गए कर्म भी उसे बंधन में नहीं डाल पाते। अगले श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण इसी सत्य को एक अत्यंत सुंदर उदाहरण के माध्यम से स्पष्ट करेंगे।

इस श्लोक में छिपे संदेश

इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।

अकर्तापन-दृष्टि
साक्षीभाव अकर्ता आत्मा
ज्ञानयोग
आत्मा-देह विवेक
कर्मयोग
कर्म में अलिप्तता
आध्यात्मिक
आत्मस्वरूप का बोध
मनोवैज्ञानिक
Witness Consciousness Non-Identification
भक्ति-दृष्टि
स्वयं को भगवान् का उपकरण मानना
दार्शनिक
इन्द्रियाँ और विषय
नैतिक
अहंकार का क्षय
व्यावहारिक
तनावमुक्त कर्म
नेतृत्व
Ego-Free Action
पारिवारिक
अपेक्षारहित सेवा
सामाजिक
सहयोग और विनम्रता
मानवता
समभाव
प्रबन्धन
Detached Efficiency

सूत्र

इन्द्रियाँ अपना कार्य करती हैं, आत्मा उनका साक्षी है।

जो स्वयं को देखने वाला जानता है, वह उलझनों में कम फँसता है।

हर क्रिया पर 'मैं' की मुहर लगाना ही बन्धन का कारण है।

शरीर की गतिविधियों और आत्मा के स्वरूप में भेद समझो।

कर्म करते हुए भी भीतर से स्वतंत्र रहना सम्भव है।

अकर्तापन की समझ मानसिक बोझ को हल्का कर देती है।

साक्षीभाव आध्यात्मिक जीवन की महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्ते' का क्या अर्थ है?
अर्थात् इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों में स्वाभाविक रूप से कार्य कर रही हैं—आँख रूप को देखती है, कान शब्द को सुनते हैं, आदि।
क्या इसका अर्थ है कि मनुष्य अपने कर्मों के लिए उत्तरदायी नहीं है?
नहीं। यह श्लोक उत्तरदायित्व से भागने की शिक्षा नहीं देता। इसका उद्देश्य आत्मा और शरीर-मन-इन्द्रियों के बीच का विवेक कराना है।
5.8 और 5.9 में क्या सम्बन्ध है?
5.8 में तत्त्वज्ञानी कहता है—'मैं कुछ नहीं करता।' 5.9 में भगवान् उसका कारण बताते हैं कि वह ऐसा इसलिए मानता है क्योंकि वह समझता है कि इन्द्रियाँ ही अपने विषयों में प्रवृत्त हैं।
क्या यह दृष्टि सामान्य साधक के लिए भी उपयोगी है?
हाँ। इससे अहंकार, तनाव और अत्यधिक कर्तापन की भावना कम होती है तथा कर्मयोग का अभ्यास सरल बनता है।
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
जब हम समझते हैं कि शरीर और इन्द्रियाँ अपना कार्य कर रही हैं, तब 'मैं ही सब कुछ कर रहा हूँ' का अहंकार कम होने लगता है।